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भारत पाकिस्तान जंग का विरोध करने के लिए भारत की एसआरएम यूनिवर्सिटी से प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार को निकालने का विरोध करो

यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख Oppose the firing of Professor Lora Santhakumar from India’s SRM university for opposing India-Pakistan war का है जो 26 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुआ था।

वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट (डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस) ने भारत के चेन्नई स्थित एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (एसआरएमआईएसटी) की ओर से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार को नौकरी से निकाले जाने और उसके तुरंत बाद उनको रिहाइश से बाहर किए जाने की कड़ी निंदा करती है।

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर सांताकुमार को उनके निजी व्हाट्सएप अकाउंट के “स्टेटस” में, मई 2025 में भारत की हिंदू-श्रेष्ठतावादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार की ओर से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ छेड़े गए आक्रामक युद्ध का विरोध करने पर निशाना बनाया गया।

प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार ने कहा कि इस तरह की सैन्य हिंसा के मुख्य शिकार हमेशा निर्दोष और कमज़ोर लोग होते हैं।

न्यूज़ मिनट वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, युवा शिक्षाविद् ने युद्ध विरोधी 12 संदेश पोस्ट किए थे। उन्होंने युद्ध से वास्तविक जीवन पर पड़ने वाले असर, जैसे आर्थिक संकट, विस्थापन और निर्दोष लोगों की मौत के बारे में आगाह किया था। एक अन्य संदेश में उन्होंने भारतीय सैन्य हमले के बाद पाकिस्तान में आम लोगों की हत्या पर भारतीय सोशल मीडिया में हो रहे जश्न की निंदा की और इसे बहादुरी नहीं बल्कि कायरता बताया था।

प्रोफ़ेसर सांताकुमार ने वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट से विस्तार से बात की और एसआरएमआईएसटी प्रबंधन के साथ हुए अपने अनुभव को बतायाः

“8 मई 2025 की सुबह मेरे एचओडी (विभागाध्यक्ष) ने मुझे ऑफ़िस बुलाया। उसी कमरे में डायरेक्टर और एक अन्य फ़ैकल्टी सदस्य मौजूद थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं उस समय अपने सोशल मीडिया हैंडल पर क्या पोस्ट कर रही हूं। यह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान की बात है, जो पाकिस्तान पर भारत के हमले के लिए सरकार का दिया गया नाम है।

मैंने कहा, ‘मैं युद्ध विरोधी संदेश और शांति के पक्ष में संदेश पोस्ट कर रही थी। मैं कुछ भी ग़लत पोस्ट नहीं कर रही हूं, सिर्फ़ अच्छी बातें ही पोस्ट कर रही हूं।’”

इस पर डायरेक्टर (वेंकट सास्त्री) ने कहा, “आप अच्छी तरह जानती हैं कि आपको कितने लोग फॉलो करते हैं और एक प्रोफ़ेसर के रूप में आप जिस यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व करती हैं, उस पर इसका कितना असर पड़ेगा। एक शिक्षक के रूप में आपने निराश किया है।” (ज़ोर देकर)

दिन में बाद में करीब 2.30 बजे एचओडी ने मुझे फिर से ऑफ़िस बुलाया और करीब 3.00 बजे मुझे निलंबन आदेश थमा दिया गया।

निलंबन मिलने के बाद मुझे प्रोफ़ेसर कविता से पता चला कि मेरे व्हाट्सएप स्क्रीनशॉट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर वायरल हो गए हैं। किसी ने पोस्ट डालकर उसे एसआरएमआईएसटी से जोड़ते हुए टैग किया था। उन्होंने बाला नाम के व्यक्ति का पोस्ट लिंक भी भेजा, जो बीजेपी का एक पदाधिकारी है। इसके बाद मुझे समझ आया कि यह सब क्यों हो रहा था।

मेरे ख़िलाफ़ एसआरएमआईएसटी के चार्ज मेमो में कहा गया कि मैंने खुद को एसआरएमआईएसटी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बताते हुए भारतीय सशस्त्र बलों के ख़िलाफ़ पोस्ट किया और एक फ़र्जी तस्वीर का इस्तेमाल किया। ये सब पूरी तरह ग़लत था, क्योंकि मुझे पीड़ित की जगह अभियुक्त के रूप में पेश किया जा रहा था। एसआरएम प्रबंधन ही मुझ पर आरोप लगा रहा था। बीजेपी आईटी विंग और दूसरे कट्टर दक्षिणपंथी समूह मुझे युद्ध विरोधी होने के कारण निशाना बना रहे थे।

इसके बाद मुझे एक शो कॉज नोटिस मिला, जिसमें कहा गया था, “हालांकि उन्होंने निजी हैसियत में पोस्ट किया, लेकिन वह यह साबित करने में असफल रहीं कि उन्होंने एसआरएमआईएसटी को टैग करते हुए पोस्ट नहीं किया। इसलिए आरोप साबित होते हैं।” (जोर दिया गया)

प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार ने आगे कहा-

“आरोप को साबित करने की ज़िम्मेदारी नियोक्ता की होती है जो आरोप लगा रहा है, न कि अभियुक्त कर्मचारी की। प्रबंधन और जांच टीम ने अब तक मुझे उस कथित फर्जी तस्वीर का सोर्स यूआरएल नहीं दिया है।

निलंबन के बाद मुझे ईमेल, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक मैसेंजर पर गाली-गलौज वाले संदेश मिलने लगे, जिनमें F__ और B__ जैसे अपशब्द शामिल थे।”

मेरी सुपरवाइजर ने मुझे फ़ोन किया और पूछा कि क्या हो रहा है। मैंने उन्हें बताया कि बाला नाम के किसी व्यक्ति ने यह पोस्ट किया है और मुझे मेरे सभी निजी प्लेटफ़ॉर्म पर अपमानजनक ईमेल और धमकियां मिल रही हैं। इस पर मेरी सुपरवाइजर ने कहा, “हम महिलाओं को अपने घरों में भी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं होती, तो देश में कैसे होगी।”

उत्पीड़न की शिकार एसआरएमआईएसटी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार। (फ़ोटोः लोरा सांताकुमार।) [Photo by Lora Santhakumar]

मोदी सरकार ने 7 मई 2025 को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी सैन्य कार्रवाई “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू की थी। सरकार ने दावा किया कि यह 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित इलाक़े में हुए आतंकी हमले के जवाब में किया गया। यह हमला पहलगाम के खूबसूरत हिल स्टेशन में हुआ था। पहलगाम में भारत के दूसरे हिस्सों से बड़ी संख्या में पर्यटक जाते हैं। इस घटना में इस्लामी आतंकियों ने आम लोगों को निशाना बनाने के इरादे से कमांडो शैली में हमला किया, जिसमें 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या कर दी गई और दर्जनों लोग घायल हुए।

बिना कोई सबूत पेश किए, मोदी सरकार ने तुरंत “सीमापार आतंकी हमले” के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहरा दिया और इसे नई दिल्ली को उपमहाद्वीप में क्षेत्रीय दबदबा स्थापित करने के अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाने का बहाना बनाया। 7 मई को भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में कई ठिकानों पर बड़े पैमाने पर अवैध हवाई हमले किए। इसके बाद चार दिनों तक लड़ाई चली, जिससे दक्षिण एशिया के दोनों परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच खुली जंग की नौबत आ गई।

पिछले साल मई में निलंबन के बाद यूनिवर्सिटी ने लोरा सांताकुमार के ख़िलाफ़ कई दिखावटी अनुशासनात्मक सुनवाइयां कींः

“मुझे चार अपमानजनक सुनवाइयों से गुजरना पड़ा। मेरे एक गवाह माधुसूदन ने जांच के दौरान बताया कि उन्होंने कभी भी मेरी वेबसाइट प्रोफ़ाइल का कोई स्क्रीनशॉट या खुद को एसआरएमआईएसटी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बताते हुए टैग किया जाना नहीं देखा। इस बात को कहीं दर्ज ही नहीं किया गया।

एसआरएमआईएसटी के लॉ अफ़सर रवि वहां मौजूद थे और पूरी जांच उन्हीं के नियंत्रण में थी। उनकी मौजूदगी डराने वाली थी, इसलिए तीसरी सुनवाई के दौरान मैंने उनकी मौजूदगी का विरोध किया।”

चौथी सुनवाई के बाद मुझे संस्थापक चांसलर पचमुथु अवरगल से अपने युद्ध विरोधी पोस्ट के साथ मिलने के लिए कहा गया। मैंने अपॉइंटमेंट लेने की कोशिश की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। जांच का अंत एक नकारात्मक रिपोर्ट के साथ हुआ। इसके बाद मैंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और राज्य महिला आयोग को एक याचिका भेजी।

इसके बाद असिस्टेंट प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार ने उस टर्मिनेशन लेटर के बारे में बताया, जो उन्हें मिलाः

“5 दिसंबर 2025 को मुझे मेरे पोस्ट के आधार पर नौकरी से निकाले जाने का पत्र मिला। आदेश में कहा गया कि मैं संस्थान में पढ़ाने के योग्य नहीं हूं और मैं अपीलीय प्राधिकारी, यानी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, के पास अपील कर सकती हूं।

मैं लगातार टर्मिनेशन बैठक की कार्यवाही, जांच बैठकों से जुड़े दस्तावेज और अहम सबूत मांग रही हूं, लेकिन इनमें से कुछ भी मुझे नहीं दिया गया है।

मैं ग़लत तरीके से निलंबन, अवैध और पक्षपातपूर्ण जांच प्रक्रिया और अनुचित बर्ख़ास्तगी से होकर गुजरी हूं। इसके कारण मेरी बदनामी हुई, मेरे करियर पर दाग लगा और मुझे जबरन मेरे रहने की जगह से बाहर कर दिया गया। मुझे मेरे धर्म, दलित ईसाई होने, और मेरे युद्ध विरोधी पोस्ट के कारण निशाना बनाया गया।

मुझे काफ़ी समर्थन भी मिला है। आईआईटी सहित 160 से ज़्यादा शिक्षाविदों और प्रोफ़ेसरों ने मेरे साथ हुए अपमानजनक व्यवहार की निंदा की है।”

लोरा सांताकुमार के साथ हुआ यह खुला उत्पीड़न किसी एक मामले तक सीमित नहीं है। इसे पाकिस्तान के प्रति भारत के आक्रामक सैन्य रुख़ की पृष्ठभूमि में समझना होगा, (हालांकि सरकार अब भी “ऑपरेशन सिंदूर” को केवल स्थगित बताती है), साथ ही बीजेपी सरकार की ओर से फैलाए जा रहे उग्र राष्ट्रवादी उन्माद और असहमति की हर अभिव्यक्ति पर राज्य स्तर पर हो रही सख़्ती के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट ने भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव के दौरान बार-बार चेतावनी दी है कि मोदी सरकार की आक्रामक सैन्य कार्रवाइयां देश के भीतर निरंकुशतावादी क़दमों से अलग नहीं हैं। इनका मकसद मज़दूरों, युवाओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों की ओर से उठने वाली हर तरह की असहमति को दबाना है।

दिसंबर 2023 में सरकार ने संसद से एक नया “देशद्रोह कानून” पारित कराया, जिसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 नाम दिया गया। इसका उद्देश्य “राष्ट्र” के ख़िलाफ़ मानी जाने वाली हर तरह की असहमति को दबाना है, जो मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हो। इस क़ानून में “राज्य, सशस्त्र बलों और सार्वजनिक शांति के ख़िलाफ़ अपराध” जैसी श्रेणियों के तहत कई आपराधिक मामलों की सूची शामिल की गई है। भारत के पुराने देशद्रोह क़ानून की तुलना में, जो खुद ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की विरासत था, बीएनएस के तहत 33 अपराधों में जेल की सज़ा का प्रावधान किया गया है और 83 अपराधों में ज़ुर्माना बढ़ाया गया है।

कठोर बीएनएस क़ानून का अब सरकार की युद्धोन्मादी नीति, सांप्रदायिक उकसावे और दमन की आलोचना करने वाली आवाज़ों को चुप कराने के लिए नियमित रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है।

पिछले साल 23 अप्रैल को लोक गायिका नेहा सिंह राठौर और लखनऊ विश्वविद्यालय की भाषाविज्ञान प्रोफ़ेसर मद्री काकोटी के ख़िलाफ़ बीएनएस के तहत मामले दर्ज़ किए गए, जिनमें लंबी जेल की सज़ा का प्रावधान है। इन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से “आतंकी हमले की ख़ुफ़िया चेतावनियों पर सरकार की प्रतिक्रिया” पर सवाल उठाए थे। बताया गया कि प्रोफ़ेसर ने पहलगाम हमले के बाद कश्मीरियों के ख़िलाफ़ हुई ज़्यादतियों की निंदा करते हुए कई पोस्ट किए थे, जिनमें कथित तौर पर “भगवा आतंकवादी” शब्द का इस्तेमाल किया गया था। यह बीजेपी से जुड़े हिंदू चरमपंथियों के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द था, जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान चला रहे हैं।

इसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के बाद अशोका यूनिवर्सिटी, हरियाणा में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद को बीएनएस के तहत गिरफ़्तार किया गया। महमूदाबाद ने एक फ़ेसबुक पोस्ट में उस दिखावटी सांप्रदायिक एकता पर टिप्पणी की थी, जिसे मोदी सरकार ने युद्ध की ब्रीफ़िंग के लिए एक हिंदू और एक मुस्लिम महिला सेना अधिकारी को आगे कर एक मिसाल पेश करने की कोशिश की थी।

प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार और अन्य युद्ध विरोधी शिक्षाविदों को निशाना बनाया जाना, भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट की ओर से किए गए विश्लेषणों की एक सघन अभिव्यक्ति है। ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत से ही बीजेपी सरकार ने इसे “राष्ट्रीय एकता” की कसौटी के रूप में पेश किया और असहमति को गद्दारी का दर्ज़ा दे दिया। कॉरपोरेट मीडिया संस्थानों ने सेना के लिए चीयरलीडर्स की भूमिका निभाई, आलोचना करने वाली आवाज़ों को दबाया और बदले की भावना को भड़काया। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स की निगरानी की गई, पत्रकारों को डराया गया और छात्रों व शिक्षाविदों पर ख़ुफ़िया नज़र रखी गई।

यह अभियान “राष्ट्रीय सुरक्षा” की चिंता से प्रेरित नहीं है, बल्कि घरेलू विरोध से शासक वर्ग के डर का नतीजा है। पाकिस्तान के साथ भारत का संघर्ष भारतीय बुर्जुआ वर्ग के रणनीतिक हितों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ उसकी गलबहियों से जुड़ा हुआ है। इसी समय सरकार कठोर खर्च कटौती नीतियां, निजीकरण और कॉरपोरेट परस्त पुनर्गठन लागू कर रही है, जिससे सामाजिक असंतोष बढ़ा है। जंग का इस्तेमाल इस ग़ुस्से को बाहर की ओर मोड़ने में होता है जबकि घरेलू स्तर पर सांप्रदायिकता भड़काई जाती है और देश के भीतर दमन को जायज ठहराया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में विश्वविद्यालयों की भूमिका बेहद अहम है। बौद्धिक जीवन के केंद्र और संभावित विरोध के स्थल होने के कारण, उन पर पिछलग्गू होने के लिए ख़ास दबाव डाला जाता है। यह प्रवृत्ति अमेरिका, यूरोप और अन्य जगहों पर विश्वविद्यालयों में साम्राज्यवादी समर्थन वाले ग़ज़ा नरसंहार के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों के क्रूर दमन में भी साफ़ दिखी।

कॉरपोरेट नेटवर्क से गहराई से जुड़े और सरकारी दया पर निर्भर एसआरएमआईएसटी जैसे निजी विश्वविद्यालय राजनीतिक दबाव को लेकर ख़ास तौर पर संवेदनशील होते हैं। लोरा सांताकुमार को नौकरी से निकालकर एसआरएमआईएसटी प्रशासन ने साफ़ संदेश दिया कि सरकार की युद्ध नीति का विरोध उसके कैंपस में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रोफ़ेसर सांताकुमार को निशाना बनाया जाना गहरी सामाजिक असमानताओं से भी जुड़ता है। वह एक दलित ईसाई परिवार से आती हैं, जो आबादी का पारंपरिक रूप से ग़रीब तबका रहा है और लगातार भेदभाव झेलता रहा है। उनकी बर्ख़ास्तगी का तात्कालिक कारण भले ही उनका युद्ध विरोधी रुख़ रहा हो, लेकिन भारत में दमन का व्यापक पैटर्न, लगातार अल्पसंख्यकों, मज़दूरों और प्रभुत्वशाली राष्ट्रवादी नैरेटिव को चुनौती देने वालों पर सबसे ज़्यादा असर डालने वाला रहा है।

प्रोफ़ेसर लोरा सांताकुमार के उत्पीड़न पर सत्ता संरचना से जुड़ी राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड यूनियनों की प्रतिक्रिया बहुत कुछ बताती है। कांग्रेस पार्टी, स्तालिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), उसकी करीबी सहयोगी सीपीआई, डीएमके और तमिलनाडु की दूसरी जातीय-क्षेत्रीय पार्टियां, सभी लोरा सांताकुमार के बचाव में सामने आने में नाकाम रहीं। किसी ने भी उनके बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघन की निंदा नहीं की।

यह रुख़ इसलिए भी है क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर और भारतीय शासक वर्ग के आधिकारिक युद्ध नैरेटिव के प्रति इनका खुद का समर्थन है।

शैक्षणिक स्वतंत्रता की रक्षा को युद्ध के विरोध से अलग नहीं किया जा सकता। जब तक भारत-पाकिस्तान संघर्ष प्रतिद्वंद्वी शासक वर्गों के हितों में चलाया जाता रहेगा, दमन और तेज़ होगा। विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों और सांस्कृतिक संस्थाओं को युद्धोन्माद के अधीन कर दिया जाएगा और जो लोग बोलेंगे, उन्हें डराने, नौकरी से निकालने या इससे भी गंभीर नतीजों का सामना करना पड़ेगा।

इसलिए लोरा सांताकुमार के बचाव का मामला, केवल किसी व्यक्तिगत अन्याय का मामला नहीं है। इसे अदालतों, विश्वविद्यालयी प्रशासन या संसदीय दांवपेंच पर भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि ये सभी एक ऐसे पूंजीवादी शासक वर्ग की राजनीति के ढांचे के भीतर काम करते हैं, जो लगातार दक्षिणपंथ की ओर झुक रहा है।

इसके लिए मज़दूर वर्ग की स्वतंत्र लामबंदी ज़रूरी है, जिसमें मज़दूरों, छात्रों और शिक्षाविदों को जातीय, धार्मिक और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुट किया जाए। इसमें सांताकुमार की तुरंत बहाली की लड़ाई को युद्ध, निरंकुशतावाद और सांप्रदायिक उकसावेबाज़ी के ख़िलाफ़ संघर्ष और सामाजिक समानता की मांग से जोड़ा जाना चाहिए। वही शासक वर्ग, जो भारत और पाकिस्तान को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं, ग़रीबी, बेरोज़गारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य व शिक्षा के ढांचे को तोड़ने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं।

वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट लोरा सांताकुमार की तुरंत बहाली की मांग करती है वो भी पूरे बकाया वेतन के साथ। साथ ही उनके अधिकारों की रक्षा और बिना किसी प्रतिशोध के डर के युद्ध का विरोध करने की सभी शिक्षाविदों, विश्वविद्यालय कर्मचारियों और छात्रों के अधिकारियों की रक्षा की मांग करती है। हम लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा को मज़दूर वर्ग के एक व्यापक, अंतरराष्ट्रीय युद्ध विरोधी आंदोलन के निर्माण से जोड़ने की लड़ाई लड़ते हैं। केवल ऐसे ही आंदोलन के जरिए युद्ध और तानाशाही की ओर बढ़ते क़दमों को रोका जा सकता है और सामाजिक समानता व वास्तविक लोकतंत्र पर आधारित समाज की नींव रखी जा सकती है।

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