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बढ़ते मज़दूर आक्रोश को दबाने की कोशिश में भारत में पुलिस ने सैकड़ों को गिरफ़्तार किया

यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख Police in India arrest hundreds in bid to suppress mounting worker unrest का है जो 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित हुआ था।

नई दिल्ली के पास नोएडा में मज़दूरों का प्रदर्शन (फोटो: हितेंद्र मेहता) [Photo: Hitendra Mehta]

भारत की राजधानी और सबसे बड़े शहरी इलाक़े दिल्ली और उसके आसपास के मैन्युफ़ैक्चरिंग बेल्ट में हज़ारों मज़दूरों की औद्योगिक बग़ावत, बढ़ते हुए सरकारी दमन का सामना कर रही है। हिंदू वर्चस्ववादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के इशारे पर पुलिस ने सैकड़ों मज़दूरों को गिरफ़्तार किया है। बीजेपी की राष्ट्रीय स्तर पर, दिल्ली में और पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा में सरकार है। ये मज़दूर कम मज़दूरी और कठोर कामकाजी हालात के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे थे। साथ ही उन दर्जनों मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं को भी गिरफ़्तार किया गया है जिन्होंने उनका समर्थन किया।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में 10 अप्रैल से शुरू हुए मज़दूर बग़ावत के बाद अब तक 400 से ज़्यादा मज़दूर गिरफ़्तार किए जा चुके हैं। अब पुलिस अपना दायरा बढ़ाते हुए उन युवा मज़दूर और राजनीतिक एक्टिविस्टों को पकड़ने की कोशिश में जुट गई है, जिन्होंने सोशल मीडिया के मार्फ़त और विभिन्न हड़ताल स्थलों पर भाषण देकर मज़दूरों के हालात और उनके संघर्ष के साथ एकजुटता दिखाई। पुलिस ने झूठा दावा किया है कि यही एक्टिविस्ट, मज़दूर अशांति के मुख्य कारण हैं और उन्हें उकसाने वाला बताया है। स्पष्ट रूप से बदनाम करने की कोशिश में अधिकारियों ने यह भी कहा है कि इनमें से कुछ का भारत के मुख्य दुश्मन पाकिस्तान से संबंध हो सकता है।

पुलिस ने एक्टिविस्टों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाना तब शुरू किया जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, हिंदू फ़ासीवादी योगी आदित्यनाथ ने मज़दूरों के विरोध को 'एक संगठित साज़िश' करार दिया और कहा कि जब प्रदेश विकास और स्थिरता की ओर बढ़ रहा है, उस समय प्रदेश की शांति और प्रगति को भंग करने के लिए ये सब किया गया।

18 अप्रैल को एक युवा मज़दूर एक्टिविस्ट आदित्य आनंद को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के एक रेलवे स्टेशन से यूपी पुलिस की टीमों ने गिरफ़्तार किया। ये टीमें उसे पकड़ने के लिए लगभग 2,500 किमी का सफ़र तय करके पहुँची थीं। उसकी गिरफ़्तारी पर 1,00,000 रुपये का इनाम रखा गया था। इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री होने के बावजूद आदित्य बेरोज़गार है।

हालत ये है कि यूपी पुलिस पूरे देश में जा जाकर सिर्फ़ मज़दूर प्रदर्शनों में मौजूद रहने के आधार पर राजनीतिक एक्टिविस्टों को गिरफ़्तार कर रही है। अब तक देशभर में कम से कम 63 लोगों को गिरफ़्तार किए जाने की ख़बर है, इसमें वे सैकड़ों मज़दूर शामिल नहीं हैं जिन्हें जेल की सींखचों में डाल दिया गया है।

पुलिस ने आदित्य आनंद को 13 अप्रैल, सोमवार को नोएडा में हुई हिंसा का “मास्टरमाइंड” बताया है। नोएडा उस नई दिल्ली से लगभग 25 किमी दूर है, जहां भारत की संसद बैठती है। पुलिस और भारतीय कॉर्पोरेट मीडिया जिस घटना को 'हिंसा' कह रहे हैं, वह उस समय हुई जब पुलिस ने मज़दूरों पर सीधा हमला किया, उन्हें बेरहमी से लाठियों से पीटा और हिरासत में लिए गए मज़दूरों को सड़कों पर घसीटा। इस हमले के बाद मज़दूरों ने पुलिस पर पत्थर और पटाखे फेंककर और पुलिस वाहनों को पलट कर अपना बचाव किया। कुछ अन्य वाहनों को अज्ञात लोगों ने आग लगा दी।

आनंद पर कई आपराधिक मामलों में आरोप लगाए गए हैं, जिनमें हिंसा भड़काना और सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाना शामिल है। पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ एक स्थानीय अदालत से जारी गैर-ज़मानती गिरफ़्तारी वारंट भी दिया है। आनंद की गिरफ़्तारी से पहले पुलिस जिन दो लोगों को उसका सहयोगी बता रही है, मनीषा चौहान और रूपरेश राय, उन्हें भी गिरफ़्तार किया गया था। आनंद की गिरफ़्तारी के अगले दिन दो और लोगों को गिरफ़्तार किया गया- नई दिल्ली में हिमांशु ठाकुर और लखनऊ में सत्याम वर्मा। इन सभी में एक समान बात यह है कि ये मज़दूर संगठन मज़दूर बिगुल के एक्टिविस्ट हैं। उनका एकमात्र 'अपराध' यह रहा है कि उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिए इन उत्पीड़ित मज़दूरों की स्थिति को दर्ज किया और उसे सार्वजनिक किया और उनके प्रदर्शनों में शामिल हुए।

आनंद की गिरफ़्तारी के बाद नोएडा की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने प्रेस से कहा कि 'नोएडा में हुई हिंसा एक दुर्भावनापूर्ण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित गतिविधि थी।' इस दावे के समर्थन में उन्होंने कोई सबूत नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ़ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के उस आरोप को दोहराया कि मज़दूर बग़ावत के पीछे 'पाकिस्तान कनेक्शन' हो सकता है।

आगे बोलते हुए पुलिस कमिश्नर सिंह ने कहा, “मनीषा चौहान, रूपेश राय और आदित्य आनंद के नाम हिंसा भड़काने के मामले में सामने आए हैं। रूपेश 2018 से लगातार देशभर में घूम रहा है और आदित्य 2020 से। जहां भी कोई आंदोलन होता है, ये वहां मौजूद रहते हैं। रूपेश रॉय खुद को ऑटो-रिक्शा चालक बताता है, जबकि आदित्य बेरोज़गार है।” नोएडा पुलिस कमिश्नर ने इन तीनों पर 'उत्तेजक भाषण देने और मज़दूरों को भड़काने' का भी आरोप लगाया.

इन सनसनीखेज़ और पूर्वाग्रह से भरे दावों के विपरीत, आदित्य के भाई आकाश आनंद ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “वह सिर्फ़ मज़दूरों के लिए उचित मज़दूरी की मांग कर रहा था, क्या यह ग़लत है?” उन्होंने आगे कहा, “उसका हमेशा सभी के प्रति मानवीय दृष्टिकोण रहा है। हमारे पास वीडियो सबूत भी है जिसमें आदित्य मज़दूरों से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने की अपील कर रहा है, लेकिन कोई हमारी बात सुनने को तैयार नहीं है।”

आदित्य आनंद ने कथित तौर पर 'अपराध में अपनी भूमिका क़बूल कर ली है।' इससे संकेत मिलता है कि पुलिस ने उससे स्वीकारोक्ति कराने के लिए पिटाई या टॉर्चर का इस्तेमाल किया हो सकता है। भारत की पुलिस हिरासत में लोगों के साथ दुर्व्यवहार और ज़बरन क़बूलनामे लेने के लिए बदनाम है, जिसके ज़रिए ग़रीब लोगों और सरकार के विरोधियों को लंबी सज़ा दिलाई जाती है।

गिरफ़्तार किए गए कुछ लोगों के वकीलों ने इन गिरफ़्तारियों को पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी बताया है और कहा है कि पुलिस ने क़ानून की बुनियादी प्रक्रिया का उल्लंघन किया है। बचाव पक्ष के वकील कबीर गुप्ता, जो आदित्य आनंद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, “ये गिरफ़्तारियां ग़ैरक़ानूनी हैं क्योंकि इन्हें क़ानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया। जब तक गिरफ़्तारी के आधार नहीं बताए जाते और हमारे मुवक्किल को गिरफ़्तारी मेमो नहीं दिया जाता, तब तक इन गिरफ़्तारियों को क़ानूनी नहीं कहा जा सकता।”

गिरफ़्तार किए गए सैकड़ों मज़दूरों की स्थिति इससे भी ज़्यादा गंभीर है। अदालत उनकी रिहाई के लिए उनके परिवारों से 20,000 रुपये की भारी भरकम ज़मानत राशि की मांग कर रही है। आनंद कुमार राम, जिन्हें हत्या, दंगा और हमले के झूठे मामलों में फंसाया गया है, उनकी पत्नी देवी बिहार से 1,000 किमी से ज़्यादा दूरी की कठिन यात्रा करके पहुंचीं। उन्होंने बताया कि उनके पति को फ़ैक्ट्री के एचआर विभाग ने बुलाया और फिर एक बगीचे में ले जाया गया जहां पुलिस उनका इंतज़ार कर रही थी। उन्होंने निराश होकर कहा, “हम 20,000 रुपये कैसे जुटा सकते हैं जब मेरे पति की मासिक आय सिर्फ़ 11,000 रुपये है।”

भारतीय शासक वर्ग का मज़दूर आंदोलनों को अपराध घोषित करने का लंबा इतिहास रहा है। सबसे कुख्यात मामलों में से एक मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन (एमएसडब्ल्यू) के पूरे नेतृत्व को फंसाने और प्रताड़ित करने का था। यह एक नई स्वतंत्र यूनियन थी जिसने 2011-12 में कई मज़बूत हड़तालें की थीं। जुलाई 2012 में हरियाणा के मानेसर स्थित प्लांट में हुई आगजनी और विवाद के बाद एमएसडब्ल्यू के 13 नेताओं पर हत्या का झूठा मामला लगाया गया। पांच साल जेल में रहने और एक एकतरफ़ा मुक़दमे, जिसमें जज ने क़ानून को तोड़ा-मरोड़ा, उसके बाद उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। हालांकि 11 जीवित नेता इस समय ज़मानत पर बाहर हैं, लेकिन उन पर फिर से जेल जाने के ख़तरे का साया है और अब भी उस कठिन दौर के असर झेल रहे हैं।

मज़दूर विरोध को दबाने के लिए प्रशासन जो कड़े कदम उठा रहा है, वह इस बात से जुड़ा है कि वह घरेलू और विदेशी पूंजी को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि भारत उन्हें लगातार बढ़ते मुनाफ़े की गारंटी देगा, भले ही वैश्विक आर्थिक स्थिति उथल पुथल वाली हो। इस पर ट्रंप के टैरिफ़ और अब ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी-इसराइली युद्ध ने और असर डाला है। हालांकि नोएडा के मज़दूरों पर हमला बीजेपी के नेतृत्व में हुआ है, लेकिन विपक्ष शासित राज्यों में भी पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है और वहां भी हड़ताल तोड़ने के लिए आवश्यक सेवाएं क़ानून का इस्तेमाल किया जाता है। कई राज्य अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बीजेपी सरकार द्वारा लाए गए 'लेबर कोड्स' को लागू कर रहे हैं, जिससे पहले से पूरी तरह निचोड़े गए मज़दूर वर्ग के लिए क़ानूनी सुरक्षा और कम हो रही है।

वर्ल्ड सोशलिस्ट वेब साइट ने नोएडा के मज़दूरों और मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी, क़ैद और चल रहे मुक़दमों की निंदा की है। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य मज़दूरों के प्रतिरोध को दबाना और वामपंथी विरोध की आवाज़ को ख़ामोश करना है, खासकर उन आवाज़ों को जो मज़दूर वर्ग के संघर्ष का समर्थन करती है। भारत और दुनिया भर के मज़दूरों, युवाओं और समाजवादी सोच रखने वाले पेशेवरों को इस अन्याय की कड़ी निंदा करनी चाहिए और इन वर्ग संघर्ष के क़ैदियों की तुरंत रिहाई की मांग करनी चाहिए।

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