यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख Swelling student protests rattle India’s far-right government का है जो 23 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुआ था।
पिछले महीने बनी नई नवेली कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जो विरोध आंदोलन शुरू किया था, उसने हज़ारों छात्र छात्रों, बेरोज़गार नौजवानों और नौकरी करने वाले प्रोफ़ेशनल्स नौजवानों को भारत की राजधानी की सड़कों पर उतार दिया। इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार के बढ़ते राजनीतिक संकट को और बढ़ा दिया।
इन प्रदर्शनों की शुरुआत, सरकार की तरफ़ से कराई जाने वाली एक बेहद कठिन और सामाजिक असमानता से जुड़ी विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार के मामले से हुई थी। लेकिन अब यह आंदोलन कहीं बड़ा रूप ले चुका है। यह रोज़गार की कमी, फैली हुई गरीबी और आम लोगों और बेहद अमीर लोगों के बीच लगातार बढ़ती खाई के ख़िलाफ़ गुस्से का केंद्र बन गया है।
इस हफ्ते यह आंदोलन और भी बड़ा हो गया, जब हज़ारों लोगों ने संसद भवन तक मार्च करने के सरकारी प्रतिबंध की परवाह नहीं की। अपने सख्त और दमनकारी रवैये के अनुसार ही मोदी सरकार ने पुलिस के जरिए कड़ी कार्रवाई की। प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे गए, लाठीचार्ज किया गया, बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया और हज़ारों अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया गया।
नौजवानों का यह आंदोलन अप्रैल में हुए उस मज़दूर आंदोलन के बाद सामने आया है, जिसमें नई दिल्ली के बाहरी इलाके नोएडा और पड़ोसी राज्य हरियाणा के मानेसर में हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतर आए थे। इन दोनों औद्योगिक इलाक़ों के मज़दूरों ने सिर्फ़ इतना मांग की थी कि उन्हें गुजारा चलाने लायक सैलरी मिले, लेकिन इसके लिए उनके ख़िलाफ़ संगीन मामले दर्ज किए गए और बड़े पैमाने पर उन्हें जेल भेज दिया गया।
भारत के छात्र और नौजवान हर मोर्चे पर मुश्किल हालात का सामना कर रहे हैं। या तो भ्रष्टाचार से भरी कॉलेज प्रवेश व्यवस्था उन्हें उच्च शिक्षा से दूर कर देती है और शुरुआत से ही उन्हें कम वेतन वाली ज़िंदगी की तरफ़ धकेल दिया जाता है, या अगर वे पढ़ाई पूरी भी कर लें, तब भी नौकरी के बाज़ार में उन्हें ज़्यादातर अस्थायी काम, बेरोज़गारी या उनकी योग्यता से कम स्तर की नौकरियां ही मिल पाती हैं।
भारत सरकार के अपने लेबर फ़ोर्स सर्वे के मुताबिक़ देश में बेरोज़गारी पिछले 45 साल में सबसे ज़्यादा है। यह आंकड़ा इतना संवेदनशील था कि मोदी सरकार ने शुरुआत में इसे सार्वजनिक नहीं किया। हर साल एक करोड़ से ज़्यादा नौजवान नौकरी की तलाश में श्रम बाज़ार में आते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम लोगों को संगठित क्षेत्र में नौकरी मिल पाती है। यह कोई संयोग या कुछ समय की समस्या नहीं है। यह उस पूंजीवादी व्यवस्था का नतीजा है, जिसने 229 अरबपतियों के लिए एक ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा की दौलत खड़ी कर दी है, जबकि पूरी एक पीढ़ी को अस्थिर और असुरक्षित ज़िंदगी जीने पर मजबूर कर दिया है।
प्रदर्शन-आंदोलन की शुरुआत
मौजूदा आंदोलन की शुरुआत 6 जून से मानी जा सकती है। उस दिन हज़ारों लोग भारत की राजधानी दिल्ली में इकट्ठा हुए। यह कॉकरोच जनता पार्टी का पहला बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम था। इस संगठन की शुरुआत सरकार विरोधी एक सोशल मीडिया मीम को मिले बड़े जनसमर्थन के बाद हुई थी। इसके बाद सीजेपी ने देश के कई बड़े शहरों में विरोध मार्च निकाले। फिर 20 जून को उसने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगातार चलने वाला धरना शुरू किया। धरना शुरू होने के आठ दिन बाद पर्यावरण और शिक्षा सुधार कार्यकर्ता सोनम वांगचुक छात्रों के समर्थन में वहीं अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए।
सीजेपी की सबसे बड़ी मांग है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें। पार्टी का आरोप है कि सरकार की तरफ़ से कराई जाने वाली नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की परीक्षाओं में बड़े स्तर पर गड़बड़ी और धोखाधड़ी हुई है।
इस आंदोलन की शुरुआत तब हुई जब पता चला कि 3 मई को हुई नीट मेडिकल प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र राजनीतिक पहुंच रखने वाले कोचिंग माफ़ियाओं ने पहले ही लीक कर दिए थे। नीट एक अनिवार्य और बेहद कठिन प्रतियोगी परीक्षा है, जिसमें हर साल करीब 23 लाख छात्र सिर्फ 1.36 लाख मेडिकल सीटों के लिए प्रतिस्पर्द्धा करते हैं। बाद में यह परीक्षा रद्द कर दी गई और 21 जून को दोबारा कराई गई। इसका असर बेहद दुखद रहा। कई छात्रों की सालों की मेहनत बेकार हो गई और टूट चुकी उम्मीदों के बीच कम से कम 12 युवाओं ने आत्महत्या कर ली।
'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम भी अपने आप में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर एक व्यंग्य है और आम जन के बढ़ते गुस्से की पहचान बन गया है। दरअसल, 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान करोड़ों बेरोज़गार युवाओं को 'परजीवी' और 'कॉकरोच' कहा था। यह कोई सामान्य टिप्पणी नहीं थी। इससे साफ़ दिखा कि सत्ता में बैठे लोग उन करोड़ों युवाओं को किस नज़र से देखते हैं, जिन्हें वे रोज़गार और बेहतर भविष्य देने में नाकाम रहे हैं। लोगों ने इस टिप्पणी को उसी तरह समझा। देश के युवाओं ने इस अपमानजनक शब्द को विरोध और चुनौती का प्रतीक बना लिया। हालांकि सीजेपी अब भी व्यवस्था की राजनीति की सीमाओं से बाहर नहीं निकली है और उसने आंदोलन को सिर्फ़ नीट घोटाले और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे़ की मांग तक सीमित रखने की कोशिश की है।
'संसद चलो'- हज़ारों लोगों का संसद की ओर मार्च
सोमवार, 20 जुलाई को हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने 'संसद चलो' मार्च निकाला। यह मार्च संसद के मानसून सत्र के पहले दिन रखा गया था ताकि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ खुला विरोध दर्ज कराया जा सके।
सरकार सीजेपी के नेतृत्व वाले इस आंदोलन के बढ़ते असर और लोगों के मजबूत इरादे से घबरा गई थी। इसलिए मार्च शुरू होने से पहले ही उसे गैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया और हर तरफ़ इसके प्रतिबंध का प्रचार किया गया, ताकि लोग डरकर पीछे हट जाएं।
लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो दिल्ली पुलिस ने सरकार के आदेश पर सख्ती से कार्रवाई की। संसद तक पहुंचने से पहले ही भारी संख्या में सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले दागे और कई बार लाठीचार्ज किया। शांतिपूर्वक जुटे नौजवानों, लड़के और लड़कियों एक जैसी पिटाई की। बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। 200 से ज़्यादा लोग इतनी बुरी तरह घायल हुए कि उनके हाथ-पैर टूट गए, सिर पर गहरी चोटें आईं और आंसू गैस के कारण उनकी हालत गंभीर हो गई। 21 साल की एक लड़की इतनी गंभीर रूप से घायल हुई कि उसे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा।
दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों को कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया, ताकि प्रदर्शनकारी शहर के बीच वाले हिस्से तक न पहुंच सकें। राजधानी के कई इलाकों में कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए, जिससे नई दिल्ली का माहौल ऐसा हो गया जैसे शहर को पूरी तरह घेर लिया गया हो।
'संसद चलो' मार्च में शामिल होने वालों में कई ऐसे बहादुर नौजवान भी थे, जिनके सिर पर पट्टियां बंधी हुई थीं। ये चोटें उन्हें एक रात पहले लगी थीं, जब पुलिस ने जंतर-मंतर से धरना हटाने के लिए उन पर हिंसक कार्रवाई की थी।
सोमवार की घटनाओं के बाद आंदोलन और तेज़ हो गया। जंतर-मंतर पर धरना फिर से शुरू कर दिया गया। मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और पटना समेत कई शहरों में समर्थन में प्रदर्शन हुए। बिहार की राजधानी पटना में बुधवार को हज़ारों लोगों के प्रदर्शन पर पुलिस ने बेहद सख्त कार्रवाई की।
बीते गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार इस युवा आंदोलन पर चुप्पी तोड़ी। सोशल मीडिया पर किए गए एक छोटे से पोस्ट में उन्होंने युवाओं के लिए चिंता जताने का दावा किया और कहा कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए एक कथित 'फ़ास्ट ट्रैक' अदालत बनाई जाएगी। पिछले दस साल में पेपर लीक की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि वह सीजेपी के प्रतिनिधियों के साथ फिर से बातचीत शुरू करने को तैयार है। सोमवार को दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई थी।
लेकिन सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। दीपके बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र हैं और पहले आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं, जोकि एक दक्षिणपंथी पूंजीवादी पार्टी है। अब तक दीपके आंदोलन को सिर्फ़ नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे़ की मांग तक सीमित रखने की कोशिश करते रहे हैं। उन्होंने उच्च शिक्षा में लगातार कम हो रहे सरकारी खर्च, छात्रों को मिलने वाली बेहद कम आर्थिक मदद या ऐसे किसी कदम की मांग नहीं की, जिससे अमीर लोगों की दौलत पर असर पड़े या सेना पर खर्च होने वाले हज़ारों करोड़ रुपये जनसेवाओं और रोज़गार सृजन पर लगाए जा सकें।
लेकिन लगता है कि दीपके भी बदलते हालात को महसूस कर रहे हैं। सोमवार को हुई पुलिस कार्रवाई के बाद सरकार के ख़िलाफ़ युवाओं का गुस्सा और बढ़ गया है। ऐसे में उन्होंने भी कुछ समय के लिए खुद को प्रदर्शनकारियों के साथ जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा, 'मोदी जी, मैं एक बार फिर आपसे अनुरोध करता हूं कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लीजिए। नहीं तो मामला सिर्फ़ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आपके इस्तीफे़ तक भी पहुंच जाएगा।'
इंडियन एक्सप्रेस ने गुरुवार को ख़बर दी कि दिल्ली पुलिस को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), 1980 के तहत मिले विशेष अधिकार इस्तेमाल करने के निर्देश दिए गए हैं। यह आदेश 15 जुलाई को जारी किया गया था और 19 जुलाई से 18 अक्टूबर तक तीन महीने के लिए लागू रहेगा। इस सख्त क़ानून के तहत पुलिस किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जिसे वह राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या ज़रूरी सेवाओं के लिए ख़तरा मानती है, बिना किसी औपचारिक आरोप के एक साल तक जेल में बंद रख सकती है।
मोदी सरकार के सबसे करीबी सहयोगी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जिन्हें आजादी के बाद भारत में लागू कुछ सबसे सख्त सरकारी कदमों का प्रमुख चेहरा माना जाता है, ने सरकारी कार्रवाई को और तेज़ करने का फैसला किया। उन्होंने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ़) के हज़ारों जवानों को राजधानी में तैनात कर दिया।
निहत्थे युवा प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ अर्धसैनिक बलों की इतनी बड़ी तैनाती यह दिखाती है कि मोदी सरकार के भीतर कितना डर है। यह ऐसी सरकार है जो गहरे राजनीतिक और सामाजिक असंतोष के बीच बैठी है और उसे इसका पूरा इल्म है।
विपक्षी दल नौजवानों के आंदोलन का फ़ायदा उठाने और उसे सीमित रखने की कोशिश में
भारत के विपक्षी दल, ख़ासकर कांग्रेस पार्टी और उसका 'इंडिया' गठबंधन, तेज़ी से खुद को प्रदर्शन कर रहे छात्रों और नौजवानों का समर्थक दिखाने में जुट गए हैं। 20 जुलाई के प्रतिबंधित 'संसद चलो' मार्च पर पुलिस कार्रवाई के अगले दिन राहुल गांधी छात्रों के समर्थन में धरने पर बैठ गए। उन्होंने कांग्रेस के दूसरे नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी के सरकारी आवास तक मार्च निकाला। वहां दिल्ली पुलिस ने उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में ले लिया।
लेकिन कांग्रेस पार्टी बीजेपी की तरह ही आम मेहनतकश लोगों के ख़िलाफ़ अपनाई गई नीतियों की साझेदार रही है। कांग्रेस और उसका 'इंडिया' गठबंधन, जिसमें कई दक्षिणपंथी, जाति आधारित, क्षेत्रीय और स्टालिनवादी दल (सीपीएम और सीपीआई) शामिल हैं, एक दूसरी दक्षिणपंथी पूंजीवादी सरकार का समर्थन करते हैं। ऐसी सरकार, जो मोदी सरकार की तरह ही मज़दूर विरोधी, निवेशक परस्त आर्थिक नीतियां अपनाए और अमेरिका के साथ चीन विरोधी रणनीतिक गलबहियां को आगे बढ़ाए।
सीपीएम, सीपीआई जैसे जिन संगठनों को लंबे समय से 'वामपंथी' माना जाता रहा है, उनसे जुड़ी सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) समेत ट्रेड यूनियनों की साख़ भी काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है। बीजेपी का विरोध करने के नाम पर इन संगठनों ने कई दशकों तक मज़दूरों के संघर्ष को दबाने का काम किया। उन्होंने केंद्र में दक्षिणपंथी सरकारों का समर्थन किया, जिन राज्यों में उनकी सरकारें रहीं वहां खुद निवेशक परस्त नीतियां लागू कीं और मज़दूरों के बड़े आंदोलनों को अलग-थलग छोड़ दिया।
नोएडा के मज़दूरों का आंदोलन और मौजूदा छात्र आंदोलन, दोनों ही पारंपरिक राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों से अलग खड़े होकर सामने आए। यह इस बात का संकेत है कि समाज में गहरा असंतोष है और लोग पूरे राजनीतिक ढांचे, चाहे वह दक्षिणपंथ हो या खुद को वामपंथ कहने वाले दल, दोनों से निराश हैं। इसी वजह से इस आंदोलन में ऐसी संभावना छिपी हुई है, जो बीजेपी सरकार और पूरे पूंजीवादी शासक वर्ग के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
लेकिन इसके साथ एक बड़ा ख़तरा भी जुड़ा है, जिसकी झलक सीजेपी के नेतृत्व की राजनीति में पहले ही दिखाई दे रही है। अगर ऐसे आंदोलनों का मकसद मज़दूर वर्ग को समाजवादी और अंतरराष्ट्रीय सोच के साथ संगठित करना नहीं होगा, तो चाहे आंदोलन कितना भी मजबूत और लड़ाकू क्यों न हो, उसे पूंजीवादी और तथाकथित वामपंथी राजनीतिक ताक़तें अपने नियंत्रण में लेकर उसका रुख़ बदल सकती हैं और आख़िर में उसे कमज़ोर कर सकती हैं। 2022 में श्रीलंका के जनआंदोलन के साथ भी यही हश्र हुआ था।
भारत की प्रवेश परीक्षाओं में फैला भ्रष्टाचार और बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा, ठीक वैसे ही जैसे बेरोज़गारी और ग़रीबी की बड़ी समस्याएं, वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था के संकट से जुड़ी हुई हैं। बीजेपी सरकार और कॉरपोरेट मीडिया जिस तरह भारत के 'उदय' का प्रचार करते हैं, वह दुनिया के दूसरे देशों, ख़ासकर अमेरिका, जहां वैश्विक पूंजीवाद का सबसे बड़ा केंद्र है, वहां हो रहे बदलावों जैसा ही है। समाज में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। बहुत कम लोगों के हाथों में दौलत और सत्ता सिमटती जा रही है। शासक वर्ग तेज़ी से कट्टर दक्षिणपंथी और बेलगाम शासन की ओर बढ़ रहा है। मेहनतकश लोगों के अधिकार लगातार कमज़ोर किए जा रहे हैं। सरकारें कहती हैं कि सार्वजनिक खर्च के लिए पैसा नहीं है, लेकिन हथियारों और युद्ध की तैयारियों पर बड़ी रकम खर्च की जा रही है।
समाजवादी सोच रखने वाले युवाओं को इस आंदोलन को मज़दूर वर्ग से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। इसकी शुरुआत नोएडा और गुरुग्राम-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों से की जा सकती है। समाज को बदलने और मोदी सरकार को चुनौती देने की असली ताक़त मज़दूर वर्ग के पास है। लेकिन इसके लिए मज़दूरों को सभी पूंजीवादी दलों, जिनमें स्टालिनवादी दल भी शामिल हैं, से राजनीतिक रूप से अलग अपनी स्वतंत्र ताक़त बनानी होगी। उन्हें मेहनतकश लोगों को साथ लेकर मज़दूरों की सरकार और समाज के समाजवादी पुनर्गठन के लिए संघर्ष करना होगा। इसके लिए वर्ग संघर्ष के नए संगठन, स्वतंत्र ज़मीनी कमेटियां और सबसे बढ़कर एक क्रांतिकारी मज़दूर पार्टी, यानी ट्रॉट्स्कीवादी पार्टी, बनाने की ज़रूरत होगी।
