यह अनुवाद अंग्रेज़ी India’s Cockroach Janata Party suspends student agitation after Modi government makes token concession के मूल का है जो 29 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुआ था।
कई हफ़्तों से चल रहा छात्र आंदोलन व्यापक सामाजिक ग़ुस्से के विस्फोट का केंद्र बनने की आशंका के चलते, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने शनिवार, 25 जुलाई को बेमन से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया।
20 जून को नई नवेली बनी और हास्य व्यंग्य वाली 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के नेतृत्व में शुरू हुए छात्र आंदोलन की मुख्य मांग थी-धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा।
कांग्रेस की अगुवाई वाले संसदीय विपक्ष से जुड़े राजनीतिक समूहों के समर्थन के साथ सीजेपी नेतृत्व ने प्रधान के इस्तीफ़े के बाद आंदोलन को तेज़ करने के बजाय उसे आनन फानन में ख़त्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया। उन्होंने मोदी और उनकी हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार के इस सीमित रणनीतिक रिट्रीट (पीछे हटने) को “जीत” की तरह पेश करने की कोशिश की।
शनिवार को जंतर-मंतर पर मौजूद छात्रों और उनके समर्थकों की भीड़ को संबोधित करते हुए सीजेपी नेता अभिजीत दीपके ने कहा, “धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया है और यह इस बात का सबूत है कि अगर आप डरते नहीं हैं तो जीत सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “लोकतंत्र में बोलने से डरना नहीं चाहिए। आप अपनी आवाज़ उठाएंगे तभी सत्ता में बैठे लोग लाइन में रहेंगे, क्योंकि वे हमारी वजह से सत्ता में हैं।”
अन्य सीजेपी प्रवक्ताओं के साथ मौजूद दीपके ने, जो कुछ समय पहले तक दक्षिणपंथी और पूंजीवाद समर्थक आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए थे, प्रदर्शनकारियों से मोदी सरकार के प्रति 'सद्भावना' दिखाने के लिए धरना समाप्त करने की अपील की। जब उसे देशभर में जनसमर्थन मिलने लगा था, आंदोलन को उस समय बंद करने के अपने फ़ैसले को सही ठहराते हुए सीजेपी नेताओं ने दावा किया कि उन्हें सरकार से कुछ अतिरिक्त मौखिक आश्वासन मिले हैं। इनमें आंदोलन में शामिल लोगों पर दर्ज सभी एफ़आईआर वापस लेने, सरकारी निगरानी में आयोजित विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक होने के कारण आत्महत्या करने वाले युवाओं के परिवारों को आर्थिक सहायता देने और चार हफ़्तों के भीतर शिक्षा सुधारों पर सीजेपी की मांगों का औपचारिक जवाब देने के वादे शामिल थे।
अब यह 'समझौता' टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। अधिकारियों ने कथित तौर पर मंगलवार तक इन अतिरिक्त बिंदुओं को लिखित रूप देने का वादा पूरा नहीं किया और यह कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने कभी भी उन लोगों के ख़िलाफ़ मामले वापस लेने पर सहमति नहीं दी थी, जिन्हें सरकारी अधिकारियों के हवाले से एक समाचार रिपोर्ट में 'सामाजिक उपद्रवी' या पहले से आपराधिक मामलों में शामिल बताया गया था।
अपने निरंकुशतावादी तौर-तरीक़ों के अनुरूप मोदी सरकार ने बार-बार प्रदर्शनकारियों को 'राष्ट्र-विरोधी' और हिंसक बताने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह थी कि 19 जुलाई की शाम जंतर-मंतर पर जुटे प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस ने, सरकार के आदेश पर, बर्बर हमला किया। अगले दिन संसद की ओर बढ़ रहे लगभग 50,000 लोगों के शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ मार्च पर लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले और पैलेट गनों का इस्तेमाल किया गया।
सोशल मीडिया पोस्टों में सीजेपी प्रवक्ताओं ने कई राज्यों में आंदोलन से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ बदले की भावना में क़ानूनी कार्रवाई शुरू करने का आरोप लगाया। सोमवार को एक्स पर सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने लिखा कि “प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई नहीं करने के समझौते का पूरी तरह उल्लंघन हुआ है।” उन्होंने दावा किया कि बिहार और बंगाल में 'सैकड़ों छात्रों' को गिरफ़्तार किया गया है और दिल्ली में भी सैकड़ों छात्रों को परेशान किया जा रहा है और हिरासत में लिया जा रहा है।
अपने छात्र समर्थकों में बढ़ते ग़ुस्से को देखते हुए सीजेपी नेताओं को चेतावनी देनी पड़ी कि अगर सरकार अपने 'वादे' पूरे नहीं करती, तो वे बुधवार से फिर आंदोलन शुरू कर सकते हैं। सीजेपी प्रतिनिधि सौरव दास ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, “अगर सरकार अपने शब्द और समझौतों का सम्मान नहीं करती, तो हमें दिल्ली ही नहीं, पूरे देश में बड़ा प्रदर्शन दोबारा बुलाना पड़ेगा।”
आंदोलन की तत्काल वजह नीट-यूजी मेडिकल प्रवेश परीक्षा का पेपर लीक होना था, जिसके कारण लगभग दो लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। यह ऐसी घटनाओं की लंबी श्रृंखला की ताज़ा कड़ी थी, जिसने भारत की केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था में गहरे भ्रष्टाचार को उजागर किया।
लेकिन छात्र आंदोलन को सिर्फ़ पेपर लीक ने नहीं, बल्कि कहीं अधिक व्यापक और गहरी समस्याओं ने ऊर्जा दी। इनमें बेहद कठिन प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षा व्यवस्था, विश्वविद्यालयों में सीटों की कमी, बेरोज़गारी, व्यापक ग़रीबी और भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था और उसकी सरकारी संस्थाओं का जेन ज़ी युवाओं के प्रति उदासीन रवैया शामिल हैं।
पिछले हफ़्ते जब मोदी सरकार ने आंदोलन को निर्दयता से कुचलने की कोशिश की, तो यह पूरे देश में और तेज़ी से फैल गया। भारत के कई शहरों में प्रदर्शन और विरोध मार्च आयोजित किए गए।
इस अचानक भड़के विरोध का सामना करते हुए मोदी सरकार ने कई रणनीतिक बदलाव किए। खुद मोदी ने पांच हफ़्तों की चुप्पी तोड़ते हुए सोशल मीडिया पर छात्रों के प्रति चिंता जताने का ड्रामा किया। सरकार ने घोषणा की कि 27 जुलाई को संसद का सत्र शुरू होने पर परीक्षा पेपर लीक मामलों के लिए 'फ़ास्ट-ट्रैक' अदालतें बनाने वाला क़ानून लाया जाएगा। इसके बाद कुछ नीट अधिकारियों को हटाया गया, सीजेपी नेताओं से बातचीत फिर शुरू की गई और अंततः धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा ले लिया गया, जिनका सरकार पहले पूरी तरह बचाव कर रही थी।
सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि छात्र आंदोलन कहीं मज़दूर वर्ग के व्यापक विरोध में आग में घी न बन जाए। यह आंदोलन दिल्ली के बाहर नोएडा और मानेसर के औद्योगिक इलाक़ों में हज़ारों शोषित मज़दूरों के विद्रोह के कुछ ही हफ़्तों बाद शुरू हुआ था। जंतर-मंतर से कुछ किलोमीटर दूर हुए उन मज़दूर प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचला गया और सैकड़ों मज़दूरों को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, जिनमें से कई अब भी बंद हैं।
2026 के पहले छह महीनों में बीजेपी सरकार ने अपने वर्गीय हमलों को और तेज़ कर दिया है। उसने मज़दूर-विरोधी श्रम सुधार लागू किए, जिनसे हड़ताल के अधिकार को और सीमित किया गया और अस्थायी अनुबंध आधारित रोज़गार को बढ़ावा मिला। साथ ही, कृषि मज़दूरों की मज़दूरी कम करने के उद्देश्य से ग्रामीण रोज़गार गारंटी कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया।
सरकार की दूसरी चिंता यह है कि आंदोलन में शामिल कई छात्र उन मध्यवर्गीय तबक़ों से आते हैं, जो पहले मोदी और बीजेपी का महत्वपूर्ण चुनावी आधार माने जाते थे। लेकिन अब ये तबक़े इस बात से निराश हो रहे हैं कि भारत की कथित पूंजीवादी तरक़्क़ी का लाभ लगभग पूरी तरह अमीर और भयंकर अमीर लोगों तक ही सीमित रहा है।
विश्वविद्यालयों में दाख़िले के लिए यह निर्दयी प्रतिस्पर्धा ख़ुद एक असमान सामाजिक व्यवस्था का नतीजा है। परिवार अपने बच्चों के लिए कोचिंग और ट्यूटर की व्यवस्था करने में भारी आर्थिक क़ुर्बानियां देते हैं, ताकि वे उन्हें लगातार आर्थिक दबाव और असुरक्षा से भरी ज़िंदगी से बाहर निकाल सकें, जबकि देश में सरकारी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था लगभग न के बराबर है।
इसके बावजूद विश्वविद्यालय की डिग्री अच्छी आय वाली नौकरी की गारंटी नहीं देती। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट की मार्च में जारी 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया' रिपोर्ट के अनुसार, 25 वर्ष से कम उम्र के विश्वविद्यालय और कॉलेज स्नातकों में बेरोज़गारी लगभग 40 प्रतिशत है, जबकि 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 6.3 करोड़ डिग्रीधारकों में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोज़गार हैं।
मोदी का धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री बनाए रखने का आग्रह केवल इस डर से नहीं था कि छात्रों को दी गई कोई भी रियायत व्यापक विरोध भड़का सकती है। मोदी की तरह प्रधान भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के आजीवन सदस्य हैं। आरएसएस वही हिंदुत्ववादी संगठन है जो बीजेपी का वैचारिक मार्गदर्शक माना जाता है और जिसके नेताओं से मोदी कैबिनेट और नीतियों पर नियमित सलाह-मशविरा करते हैं।
शिक्षा मंत्री के रूप में अपने पांच सालों में प्रधान ने शिक्षा पर चौतरफ़ा हमला किया। उन्होंने निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देने, शिक्षा पर सरकारी ख़र्च घटाने और आरएसएस-प्रेरित पाठ्यक्रम बदलावों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस छात्र आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसने उन सांप्रदायिक विभाजनों को पार करते हुए छात्रों को एकजुट किया, जिन्हें बीजेपी और व्यापक भारतीय शासक वर्ग लगातार भड़काते रहे हैं।
दिल्ली की सड़कों पर मोदी सरकार को चुनौती मिलने के बाद आंदोलन को मिले अचानक समर्थन के बावजूद सीजेपी नेताओं का पीछे हटना आश्चर्यजनक नहीं था। शुरुआत से ही उन्होंने आंदोलन को बेहद सीमित मांगों तक बांधने की कोशिश की, मानो एक बीजेपी मंत्री को हटाने से व्यवस्था की बुनियादी समस्याएं बदल जाएंगी। सीजेपी ने शिक्षा व्यवस्था के सभी स्तरों पर भारी सार्वजनिक निवेश या विश्वविद्यालय छात्रों के लिए जीवन-निर्वाह योग्य भत्ता तक की मांग नहीं उठाई, भारत के पूंजीपति अभिजात वर्ग के प्रभुत्व या सेना पर होने वाले भारी ख़र्च को चुनौती देना तो दूर की बात है।
सोमवार की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सीजेपी नेतृत्व ने बताया कि उसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल से सलाह मिल रही है।
कांग्रेस भी बीजेपी की तरह इस छात्र आंदोलन को स्थापित संसदीय राजनीति की सीमाओं में बांधे रखना चाहती है और इसे वर्ग संघर्ष की दिशा में बढ़ने से रोकना चाहती है। राहुल गांधी की प्रतीकात्मक गिरफ़्तारी और पुलिस हिंसा की आलोचना जैसे कांग्रेस के 'विपक्षी' नाटकीय कदम इस तथ्य से ध्यान हटाने के लिए हैं कि वह भी मोदी और बीजेपी की तरह निवेशक परस्त नीतियों और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के पक्ष में है।
सबसे हानिकारक भूमिका विभिन्न स्टालिनवादी दल निभा रहे हैं, जो बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे का विरोध करने के नाम पर लगातार वर्ग संघर्ष को दबाते रहे हैं और कांग्रेस-नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की बैशाखी के रूप में काम करते हैं।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के कुछ घंटों के भीतर ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और उसका छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) इसे 'ऐतिहासिक जीत' बताने में जुट गए। छात्रों के साहस और त्याग की प्रशंसा करते हुए भी उन्होंने यह भ्रम फैलाया कि छात्र और व्यापक रूप से भारत के मज़दूर और ग्रामीण मेहनतकश पूंजीवादी सत्ता प्रतिष्ठान से अपील करके अपने हितों के पक्ष में रियायतें हासिल कर सकते हैं, जबकि दुनिया भर में व्यवस्थाएं तानाशाही और युद्ध की ओर बढ़ रही हैं। सीपीएम पोलित ब्यूरो ने कहा, “युवाओं ने जो साहस और दृढ़ता दिखाई है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।”
इनमें से किसी भी तथाकथित 'कम्युनिस्ट' संगठन ने छात्रों से यह नहीं कहा कि वे नोएडा और मानेसर के मज़दूरों से संपर्क करें और बीजेपी सरकार और भारत के भ्रष्ट पूंजीपति अभिजात वर्ग के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग की विशाल सामाजिक शक्ति को संगठित करने में मदद करें।
स्थिति अब भी विस्फोटक बनी हुई है। सीजेपी नेतृत्व और विपक्षी दलों की तमाम कोशिशों के बावजूद छात्र आंदोलन फिर भड़क सकता है। समाजवादी सोच रखने वाले छात्रों के लिए ज़रूरी है कि वे यह समझें कि विश्वविद्यालयों में सीटों की कमी, रोज़गार के अवसरों का अभाव, सांप्रदायिक राजनीति, राज्य दमन और युद्ध जैसी समस्याओं का समाधान केवल मज़दूर वर्ग के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय समाजवादी संघर्ष के माध्यम से ही संभव है।
