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भारतीय मतदाता सूचियों की सफ़ाईः मज़दूर वर्ग को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की मोदी सरकार की मुहिम

यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख India’s voter purge: The Modi government’s drive to disenfranchise the working class का है जो 8 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हुआ था।

मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने के ख़िलाफ़ भारत की राजधानी दिल्ली में दो अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस प्रदर्शनकारियों पर हमला करती हुई। (फ़ोटो: दीपक सिंह/फ़ेसबुक) [Photo: Deepak Singh/Facebook)]

दो अक्टूबर, शुक्रवार से भारत के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इसकी वजह इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदुत्ववादी सरकार पर मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर ग़ैर-क़ानूनी तरीके से नाम हटाने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक़, मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) को नियमित रूप से मतदाता सूची की सफ़ाई करने की प्रक्रिया बताया गया था, लेकिन इसका इस्तेमाल अब तक 13 करोड़ से 15 करोड़ नाम हटाने के लिए किया गया है। यह भारतीय गणराज्य के इतिहास में अपनी तरह की अभूतपूर्व कार्रवाई है।

उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक कई शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं। लेकिन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस समेत पूंजीवादी विपक्षी पार्टियां, स्टालिनवादी सीपीएम और छोटे बुर्जुआ वर्ग की कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने संघर्ष को एक सीमित मांग तक बांध दिया है। उनकी मांग सिर्फ़ इस एक अधिकारी को हटाने की है। इनमें से कोई भी मोदी सरकार को सत्ता से हटाने की मांग नहीं कर रहा। यह सरकार अब खुले तौर पर पुलिस दमन और तानाशाही तरीकों से युवाओं और मज़दूर वर्ग को निशाना बना रही है, जबकि बीजेपी के पास संसद में बहुमत नहीं है।

ये सभी पार्टियां मज़दूर वर्ग की सामाजिक ताक़त को संगठित करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के संघर्ष को व्यापक आंदोलन से जोड़ने के ख़िलाफ़ हैं। इस आंदोलन को ठेका मज़दूरी, बड़े पैमाने पर भुखमरी, जर्जर या नदारद सार्वजनिक सेवाओं, ब्रिटिश राज के चरम दौर के बराबर पहुंचती सामाजिक असमानता और इन सबको जन्म देने वाली पूंजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष से जोड़ने की कोशिश नहीं की जा रही है।

बीजेपी की ओर से मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने और मतदान के लिए नई बाधाएं खड़ी करने की तारीफ़ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी की है। ट्रंप भी 2026 के मध्यावधि चुनावों में धांधली करने की कोशिश कर रहे हैं। अगस्त में उन्होंने सार्वजनिक रूप से भारत की चुनाव व्यवस्था और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तारीफ़ की। उन्होंने भारत में फोटो पहचान पत्र और एसआईआर के इस्तेमाल का ज़िक्र किया। ट्रंप ने अमेरिका में SAVE America Act को आगे बढ़ाने और मतदाताओं की नागरिकता की जांच के लिए संघीय डेटाबेस इस्तेमाल करने के समर्थन में भारत की व्यवस्था का हवाला दिया। यह व्यवस्था भारत की एसआईआर प्रक्रिया के कुछ पहलुओं से मिलती-जुलती है।

ग़रीबों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाकर नाम हटाना

मतदाता सूची से जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनमें भारी संख्या ग़रीबों, प्रवासी मज़दूरों, दलितों और मुसलमानों की है। ये वही तबके हैं, जो बीजेपी के ख़िलाफ़ वोट करते हैं। एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाताओं को ऐसे दस्तावेज़ देने होते हैं, जिनसे साबित हो सके कि वे सूची में बने रहने के योग्य हैं। यह शर्त उलझन पैदा करती है और उन लाखों लोगों के लिए पूरी करना नामुमकिन है, जिनके पास सरकार के सही दस्तावेज़ नहीं हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक़, मतदाता सूची के डेटाबेस को दिल्ली में केंद्रीकृत करके इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। इस दौरान ज़मीनी स्तर पर क़ानून के तहत नियुक्त चुनाव पंजीकरण अधिकारियों को दरकिनार कर दिया गया। नए वोटरों के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फ़ॉर्म में भी “अनधिकृत और ग़ैर-क़ानूनी” बदलाव किए गए।

नाम हटाने का तरीक़ा भी उतना ही अहम है, जितनी इसकी व्यापकता। इस साल जुलाई में पहली बार वोट देने वालों के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 में जान-बूझकर बदलाव किया गया। इसकी जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक़, इसमें मोदी के क़रीबी सहयोगी ज्ञानेश कुमार की मिलीभगत होने की आशंका है। फ़ॉर्म में आवेदकों से पूछा गया था कि क्या वे, उनके माता-पिता या दादा-दादी पहले की मतदाता सूचियों में दर्ज थे। इससे कुछ मतदाताओं को सूची से बाहर किए जाने की आशंका पैदा हुई।

इसके बाद फ़ॉर्म-7 को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया, जबकि इस फ़ॉर्म का मक़सद मतदाता सूची को सही रखना था। इसके ज़रिए मृत मतदाताओं, एक से ज़्यादा बार दर्ज नामों और उन लोगों के नाम हटाए जाते थे, जो अपना निर्वाचन क्षेत्र स्थायी रूप से छोड़ चुके हों।

रिपोर्टों के मुताबिक़, बीजेपी नेताओं ने कर्नाटक और तेलंगाना में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए पहले से भरे हुए हज़ारों फ़ॉर्म-7 बांटे। कर्नाटक में एक बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) ने बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ औपचारिक पुलिस शिकायतें दर्ज कराई हैं। बीएलओ स्थानीय सरकारी या अर्ध-सरकारी कर्मचारी होते हैं, जिन्हें एसआईआर के दौरान मतदाता सूची अपडेट करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है।

मतदाता सूची की सफ़ाई की राजनीतिक प्रकृति पश्चिम बंगाल में साफ़ दिखी। इस साल की शुरुआत में राज्य विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर के तहत लगभग 90 लाख नाम हटा दिए गए। यह कुल मतदाताओं का करीब 12 फ़ीसदी था। बीजेपी ने राज्य के इतिहास में पहली बार जीत दर्ज की। डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस ने राज्य चुनावों पर अपने विश्लेषण में लिखा था, “सुप्रीम कोर्ट की मिलीभगत से बीजेपी के प्रभाव वाले चुनाव आयोग ने अपनी बेहद विवादित एसआईआर के तहत मनमाने तरीक़े से लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए। इनमें ज़्यादातर ग़रीब लोग थे और मुसलमानों की संख्या अनुपात से कहीं ज़्यादा थी।”

प्रदर्शनों के प्रति मोदी सरकार का रवैया पहले जैसा ही रहा। शुक्रवार, 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के दिन नई दिल्ली को क़िले में बदल दिया गया। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत संसद मार्ग इलाक़े में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई। इसके तहत पांच या उससे ज़्यादा लोगों के एक जगह जमा होने, नारे लगाने, भाषण देने और जुलूस निकालने पर रोक लगा दी गई।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने वाले दो मुख्य रास्तों को रोकने के लिए लगभग 4,000 पुलिसकर्मियों के साथ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और रैपिड एक्शन फ़ोर्स की टुकड़ियां तैनात की गईं। दिल्ली मेट्रो के 12 स्टेशन बंद कर दिए गए। 500 से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। इनमें दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना भी शामिल थीं।

सरकार ने यही तरीक़ा अप्रैल में नोएडा के कामगारों के आंदोलन के दौरान अपनाया था। उस समय हज़ारों ठेका मज़दूरों ने बर्बर शोषण के ख़िलाफ़ हड़ताल की थी, लेकिन जवाब में बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां हुईं, झूठे मामलों में फंसाया गया और हिंसा की गई। जुलाई में छात्रों के प्रदर्शनों के दौरान भी पुलिस ने संसद की ओर मार्च कर रहे हज़ारों लोगों पर आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया।

निहत्थे प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ भारी हथियारों से लैस अर्धसैनिक बलों की तैनाती उस डर को दिखाती है, जो इस सरकार के भीतर मौजूद है। यह सरकार “एक राजनीतिक और सामाजिक ज्वालामुखी के ऊपर बैठी है और उसे इसका एहसास है।”

प्रदर्शनों का नेतृत्व विपक्षी पार्टियां और सीजेपी कर रही हैं। सोशल मीडिया पर भारी ग़ुस्से के बाद अभिजीत दीपके ने सीजेपी की स्थापना की थी। वह बोस्टन यूनिवर्सिटी से प्रशिक्षित कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट हैं और दक्षिणपंथी आम आदमी पार्टी से उनके गहरे संबंध रहे हैं। डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस के मुताबिक़, सीजेपी “भारत के वंचित युवाओं को पूंजीवादी राजनीति की ओर वापस मोड़ने के लिए बनाया गया एक राजनीतिक सेफ़्टी वॉल्व है।”

मुंबई में सीजेपी का रवैया इस मामले में अहम है। दीपके ने 2 अक्टूबर को मुंबई में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान “सहयोग” के लिए महाराष्ट्र पुलिस की सार्वजनिक रूप से तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि पुलिस ने दिल्ली पुलिस की तरह लाठियों का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद पुलिस ने दिल्ली जा रहे सीजेपी के वालंटियर्स को नोटिस जारी कर उनकी यात्रा और ख़र्च का हिसाब मांगा।

दीपके ने दुख जताते हुए पूछा, “क्या अब पुलिस को 1,000 से 1,500 रुपये के ट्रेन टिकट का हिसाब भी चाहिए?” यह घटना उस आंदोलन की नादानी या जान-बूझकर ख़ुद को धोखा देने की प्रवृत्ति दिखाती है, जो सोचता है कि पूंजीवादी राज्य की दमनकारी मशीनरी से “बेहतर व्यवहार” की अपील करके रियायतें हासिल की जा सकती हैं।

स्टालिनवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम की भूमिका ख़ास तौर पर ख़राब रही है। सीपीएम और उसके छात्र संगठन स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, लेकिन उनका मक़सद आंदोलन को पूंजीवादी विपक्ष की संसदीय रणनीति के अधीन रखना था।

सीपीएम ने दशकों तक बीजेपी से लड़ने के नाम पर दक्षिणपंथी सरकारों को सहारा दिया है। उसे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग को संगठित करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि इससे कांग्रेस पार्टी और भारतीय राज्य के साथ उसके संबंध ख़तरे में पड़ सकते हैं। सीपीएम के महासचिव ने सीजेपी को ऐसा संगठन बताया है, जिसके बारे में “पूरी गंभीरता से अध्ययन करने की ज़रूरत है।” यह उस पार्टी की भाषा है, जो यह हिसाब लगा रही है कि सीजेपी के साथ गठबंधन उसकी कमज़ोर होती चुनावी स्थिति के लिए कितना उपयोगी हो सकता है।

डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस ने बार-बार बताया है कि स्टालिनवादी राजनीतिक प्रतिष्ठान का अभिन्न हिस्सा हैं। वे वर्ग संघर्ष को दबाते हैं और मज़दूर वर्ग को कांग्रेस पार्टी, दूसरी दक्षिणपंथी जाति आधारित पार्टियों और जातीय-सांप्रदायिक राजनीति करने वाले दलों का पिछलग्गू बनाए रखते हैं।

चुनाव आयोग: बीजेपी का औज़ार

भारत के चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच संबंध को समझना इस पूरे मामले के लिए अहम है। मोदी सरकार ने 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम पारित कराया। इसके तहत चुनाव आयुक्तों के चयन में पहले से मौजूद सीमित स्वतंत्र प्रक्रिया को भी ख़त्म कर दिया गया। अब चयन प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता वाले पैनल के ज़रिए होता है। इसके नतीजे में अब सिर्फ़ बीजेपी के चापलूसों को चुना जा रहा है।

ज्ञानेश कुमार को फ़रवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था। उस समय विपक्ष के नेता ने इस नियुक्ति पर असहमति दर्ज कराई थी।

एसआईआर की घोषणा अक्टूबर 2025 में हुई थी और इसके बाद इसे भारत के ज़्यादातर राज्यों में लागू किया गया। इंडियन एक्सप्रेस की जांच में चुनाव आयोग के भीतर अभूतपूर्व मतभेद सामने आए। तीन में से दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीने के दौरान कुमार के उन फ़ैसलों पर कम से कम 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं दी गई थी।

इनमें मतदाता पंजीकरण फ़ॉर्म में “अनधिकृत और ग़ैर-क़ानूनी” बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस का “धीरे-धीरे केंद्रीकरण” और उन मतदाताओं के ख़िलाफ़ अपील दायर करना शामिल था, जिनके नाम अधिकारियों ने दोबारा सूची में शामिल किए थे। इन आपत्तियों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी बेहद ख़राब रही है। उसने एसआईआर प्रक्रिया को मंज़ूरी दी। जब पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों की संख्या को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया, तो अदालत ने समीक्षा के अंतिम चरण की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग से लेकर न्यायिक अधिकारियों को सौंप दी। लेकिन मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया को जारी रहने दिया।

अदालत के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं को “परजीवी” और “कॉकरोच” कह चुके हैं। पिछले तीन दशकों में भारतीय पूंजीपति वर्ग के तेज़ी से दक्षिणपंथ की ओर बढ़ने के साथ सुप्रीम कोर्ट भी हिंदुत्ववादी बीजेपी सरकार की नीतियों पर मुहर लगाने वाली संस्था बन गया है। इसका एक उदाहरण 2019 का फ़ैसला है, जिसमें अदालत ने सरकार को ढहाई गई बाबरी मस्जिद की जगह हिंदू राष्ट्रवादी मंदिर बनाने का आदेश दिया था।

मतदाता सूची में हेरफेर सिर्फ़ नाम हटाने तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में पुलिस को सीधे मतदान रोकने के लिए तैनात किया गया। 2024 के आम चुनाव के दौरान संभल निर्वाचन क्षेत्र में पुलिस मुस्लिम बहुल गांवों में पहुंची। वहां मतदान रोकने के आदेश दिए गए, पहचान पत्र ज़ब्त किए गए और महिला मतदाताओं व बुज़ुर्गों समेत मतदाताओं पर लाठीचार्ज किया गया।

2022 के रामपुर उपचुनाव में भी इसी तरह की हिंसा हुई थी। वहां मतदान घटकर 27.8 फ़ीसदी रह गया और बीजेपी ने वह सीट जीत ली, जो दो दशक से समाजवादी पार्टी के पास थी। पुलिस ने दावा किया कि वह “मतदान में धोखाधड़ी” रोक रही थी। लेकिन एक स्थानीय नेता के शब्दों में, असलियत “पुलिस की खुली गुंडागर्दी” थी, जिसका मक़सद मतदाताओं को डराकर बीजेपी के पक्ष में वोट डलवाना था।

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग एक बंद रास्ता है। विपक्षी पार्टियां और सीजेपी इस एक मांग तक ख़ुद को इसलिए सीमित रखती हैं, क्योंकि वे उस व्यवस्था को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करतीं, जिसका ज्ञानेश कुमार सिर्फ़ एक अधिकारी हैं।

चुनाव आयोग कोई निष्पक्ष संस्था नहीं है, जिस पर बीजेपी ने कब्ज़ा कर लिया हो। इसके बजाय, वह पूंजीवादी राज्य का एक औज़ार है। मतदाता सूची में हेरफेर भारत में पूंजीवादी शासन के संकट का संकेत है। बीजेपी के पास संसद में बहुमत नहीं है और उसे बड़े पैमाने पर मतदाताओं के अधिकार छीनने का सहारा लेना पड़ रहा है, क्योंकि वह लोकप्रिय समर्थन के आधार पर चुनाव नहीं जीत पा रही है।

लेकिन विपक्ष कोई विकल्प पेश नहीं करता। कांग्रेस पार्टी और उसका इंडिया गठबंधन भी मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ वर्ग संघर्ष के सहयोगी हैं। वे बीजेपी की तरह ही मज़दूर विरोधी और निवेशक परस्त सुधारों का समर्थन करते हैं। वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ नई दिल्ली के चीन-विरोधी सैन्य गठबंधन के भी समर्थक हैं।

स्टालिनवादी सीपीएम और उसकी पुरानी, छोटी सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) भी कोई विकल्प नहीं हैं। दशकों से उन्होंने वर्ग संघर्ष को दबाया है, प्रतिक्रियावादी सरकारों को सहारा दिया है और जिन राज्यों में ख़ुद सरकार बनाई, वहां निवेशक परस्त नीतियां लागू की हैं। सीजेपी युवाओं के असली ग़ुस्से को संगठित करती है, लेकिन उसे वापस पूंजीवादी राजनीति की ओर मोड़ देती है।

मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के भीतर कोई समाधान नहीं है, क्योंकि सभी पार्टियां, जिनमें स्टालिनवादी पार्टियां भी शामिल हैं, बड़े कारोबारियों के हितों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करती हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने के ख़िलाफ़ संघर्ष को पूरी पूंजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष से जोड़ना होगा। इसका मतलब है कामगारों की सरकार और समाज के समाजवादी पुनर्गठन के लिए लड़ना, जो विश्व समाजवादी क्रांति का हिस्सा हो।

कांग्रेस, बीजेपी, स्टालिनवादियों और छद्म-वामपंथ से स्वतंत्र होकर मज़दूर वर्ग को राजनीतिक रूप से संगठित करना ही मोदी सरकार को हराने और भारत के मेहनतकश लोगों की लोकतांत्रिक व सामाजिक आकांक्षाओं को पूरा करने का रास्ता है।

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